रात में थी,आँखे पानी
रात में थी,आँखे पानी में बताओ क्या क्या झेले इस ज़िंदगानी में दिल में तू है , तेरी यादों का मेला है फिर भी मन है कि एकदम अकेला है दिल में कोलाहल, कोहराम बहुत है बाहर आराम इतना लिखा बस रात की कहानी में बताओ क्या क्या झेले इस ज़िंदगानी में लब सिला हो आँख चिलाये तब बताओ कैसे कोई चुप कराए तब जो थी चुप कराने वाली उसका पता ही नही वो कहती है मेरा उससे वास्ता ही नही बस यही सुन लो मेरी जुबानी में बताओ क्या क्या झेले इस ज़िंदगानी में