कुछ गायन में.
मुक्तक.... मैं दिन भर रो नहीं पाता ,रात भर सो नहीं पाता मैं जिन्दा हु मगर फिर भी क्यू जिन्दा हो नहीं पाता इश्क़ करके क्या गुनाह किया मैंने मेरे मौला मैं गंगा भी नहाया हु पर इसको धो नहीं पता जो कल को दोस्त होते थे, वो अब फसाद करते है ये आंसू आज भी उनसे बहुत फ़रियाद करते है इतने दिन में बदली तो बस एक बात बदली है की वो हमे याद करती थी पर हम उसे याद करते है कोई आँखों में ही खोया था , कोई आँखों में ही खोया है इश्क़ जिसने भी किया हैं रात भर कौन सोया है रकीब और मुझमे तो बस बात इतनी है की मैं भी खूब रोया हु और वो भी खूब रोया है निगाहे मिल जो जाएँगी , दिल खो ही जाता है कहा कोई लौट पाता इसमें जो ही जाता है कौन चाहेगा कैद होना इन कैद खानो में इश्क़ को कौन करता हे ये तो बस हो ही जाता है मोहब्बत के ही पाले में ये क्यों इल्जाम होता है नुमाइश दिल टूटने पर क्यों सरेआम होता है मौत अपनाने से कुछ नहीं मिलता...