कुछ गायन में.

 मुक्तक....

 

मैं दिन भर रो नहीं पाता ,रात भर सो नहीं पाता 
मैं जिन्दा हु मगर फिर भी क्यू जिन्दा हो नहीं पाता 
इश्क़ करके क्या गुनाह किया मैंने मेरे मौला 
मैं गंगा भी नहाया हु पर इसको धो नहीं पता 

जो कल को दोस्त होते थे, वो अब फसाद करते है 
ये आंसू आज भी उनसे बहुत फ़रियाद करते है 
इतने दिन में बदली तो बस एक बात बदली है 
की वो हमे याद करती थी पर हम उसे याद करते है 

कोई आँखों में ही खोया था , कोई आँखों में ही खोया है 
इश्क़ जिसने भी किया हैं रात भर कौन सोया है 
रकीब और मुझमे तो बस बात इतनी है
की मैं भी खूब रोया हु और वो भी खूब रोया  है

निगाहे मिल जो जाएँगी , दिल खो ही जाता  है
कहा  कोई  लौट  पाता इसमें  जो ही जाता   है
कौन चाहेगा कैद होना इन कैद खानो में 
इश्क़ को कौन करता हे ये तो बस हो ही जाता  है

मोहब्बत के ही पाले में ये क्यों इल्जाम होता  है
नुमाइश दिल टूटने पर क्यों सरेआम होता  है
मौत अपनाने से कुछ नहीं मिलता ज़माने को 
किसीका नाम होता है कोई बदनाम होता है

हर पल किसी से मिलने को बेकरार बैठा हु
मैं अबतक एक ही कस्ती में सवार बैठा हु 
ना जुए की आदत हे, न सटे की आदत हे 
न जाने फिर भी कैसे मैं दिल को हार बैठा हु 

माना आसमा है  तू, माना की हवा है तू 
मेरे रूह मैं बहती पवन सी फिजा  है तू 
दुनिया कुछ तुम्हे समझे दुनिया कुछ तुम्हे मने
 मेरा हर जख्म  है तू , मेरी हर दवा है तू है

जो तू नहीं मेरी तो खुदा से गिला क्या  है
जब मुझको खुद नहीं मालूम की तेरा फैंसला क्या  है
मैं खुदा से कहु क्यों कुछ  मैं खुदा को कहु क्यों कुछ 
माना की दिया न कुछ पर उसको भी मिला क्या   है

न मेरी बात सुनती हो न मुझसे कुछ भी कहती हो 
न जाने रूठी हो मुझसे या खुद से रूठ बैठी हो 
तम्मना  है  ये बस मेरी कोई तेरा पता पूछे 
तो उससे बोल देना की हमारे दिल मैं रहती हो 

मेरे पाने या खोने में तुम्हारा जिक्र होता है
मेरे हँसने या रोने में तुम्हारा जिक्र होता है 
हवाएं और महक तो हमेशा साथ रहते है 
मेरा जिक्र  होने में तुम्हारा  जिक्र होता है 


हमारे सामने तू खुद को बयां कर नहीं सकती
दर्द तो क्यों देती हो जो दवा  कर नहीं सकती
इक इक कशमकश मेरे तेरे, ज़िंदगानी में 
मैं ख़फ़ा हो नही सकता , तू वफ़ा कर नही सकती 

तुमने हमको बतलाया, जख्मो को कैसे सीया जाये
तुमने हमको बतलाया, कैसे हँस हँस के आँसू पिया जाये
तो ये सब बताने वाली एक बात भी हमको बताओ
जिसने इतना कुछ बतलाया उसके बिन कैसे जिया जाये

इस जायदाद पर, इस बार तुम दीपक क्यों जलाई नही 
इस बार मेरे दिल पे तुम रंगोली क्यों बनाई नही 
सब ने दी बधाईया अपने अपने ढंग से पर  
जिसकी मुझे जरूरत थी, उसकी बधाई क्यों आई नही

इन्ही नजरों से देखा हु, तुम्हारे यार का जलवा 
देख कर मुस्कुराया हु , खुद के हार का जलवा
एक ही पल में सौ बार,मर मर के जिंदा हु 
ये है इश्क़ ,मोहब्बत और जालिम प्यार का जलवा

जैसा तुमने चाहा  मैंं  वैसा हो नही पाया 
रंग में डूब कर भी  रंग  जैसा हो नही पाया 
हर ख्वाब देखा बस तुम्हे अपना बनाने का 
हकीकत में कभी लेकिन ऐसा हो नही पाया 

मैं तुमको भूल जाऊ ये तो मुमकिं नही यारा
सांसो का अहसास अब तुम्हारे बिन नही यार 
हर दिन का सफर तुमसे शूरू,तुम तक ही जाना है
जिसमे तुम नही वो दिन भी कोई दिन नही यारा

 

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