किराये का मकान.....................उसका दिल

किराये के मकान में था मै रहता
गंगा के धरा सा मैं बहता
खूब बनती थी माकन मालिक से मेरी
एक बार होइ कुछ पल की देरी
 माकन मैं गया तो देर हुई
मालिक मेरी गैर होइ
मालिक से फिर थोड़ा बात किया
मालिक ने फिर माकन मै जगह दिया
दोस्ती की इबाबत मोहब्बत बनी
दिल मेरा कई ख्वाब बुना
मगर इजहार कर के जो मैंने गलती की
 उस गलती हर्जाना मेने दिया कई गुना
बात उसकी भी सही टी दोस्त मानते थे हमे
मैंने ही मोहाब्बत ,चाहत और वफ़ा के गढ़े खने
बाते कम हो गईं राते गम हो गयी
आखिरी लव्स उनोहोने हमसे कहा
''चीड़  होती हे तुमसे कोई रिस्ता न रहा''
आँखों से पानी बहने लगा
पता चला माकन में कोई और रहने लगा।

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