chehra banta dekha he
मैंने खुली आँखों में तुमको बदलते देखा हे।
एक गुलाब को , सुखी पट्टी बनते देखा हे।
हवाओ में कभी अंगार थे नहीं।
मगर अरमानो को जलते देखा हे।
कौन कहता हे नशा बर्बादी का जड़ हे।
मेने तो इसका करोबार चलते देखा हे।
मोहबत न कर यार सुजाव ले लो।
मेने इसमें लोहा पिघलते देखा हे।
क्यों खुस हे इतना सोहरत पा के।
मेने तो सूरज को भी डालते देखा हे।
जो तुम्हे इतना गुरुर हे उनपे।
दिल को बहुत जल्दी बदलते देखा हे . .....
DHALTA SURAJ
: DIVYANSH PATHAK
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