उपहास बनाती दुनिया है ....

मेरे हर एक इच्छा को
उपहास बनाती दुनिया है ।
मेरे हर मंजिल को
हास्य बनाती दुनिया है ।
अब एक ही ख्वाइश बची है
मेरे ख्वाबो के झोली में ,
किसीका रंग चढ़ गया है
शायद इस बार के होली में ।
में जिसपे खुलके सोऊंगा
वो साहित्य का चादर है !
अब कोई कारोबार नही भाता
बस इसी का मुझको आदर है ।
में कुछ न कर पाऊंगा
ये विश्वास बनाती दुनिया है।
मेरे हर एक इच्छा को
उपहास बनाती दुनिया है ।

ये पथ जो तय किया है ,
वो हिमालय पर्वत जैसा है ।
दुनिया को बस कहने दो ,
ये  तेरा रास्ता कैसा है ।
दुनिया क्या क्या बोलती है
वो चुप चाप में सहता हु !
जुबान को शांत रखता हूं
क्योंकि कलम से कहता हूं ।
स्याही कुछ नही है
में अपने जख्म से कहता हु ।
जब दर्द आदत पड़ जाता है
तो कलाम से कहता हूं ।
मेरे जिंदा दिली को
लाश बनाती दुनिया है ।
मेरे हर एक इच्छा को
उपहास बनाती दुनिया है ।।
                               - दिव्यांश पाठक

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