ग़ज़ल - पहचान मेरा
हर मोहतरम से है पहचान मेरा
फिर भी खतरे में ,होना इंसान मेरा
जिंदा हु फिर भी ये खोज जारी है
आखिर है कहा पर है जान मेरा
में उसके दरबार में उसी की रुस्वाई कर आया
वो चिलाता रहा "ये है गुलदान मेरा"
जब लहू , आँसू,दिल दडकन सब जगह तुम हो
तो बताव किसे पुकारे अब ये ज़ुबान मेरा
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