बहुत रोया.....

बहुत रोया रात भर एक खुद के जज्बात पर
वो मुझे गैर कह दी बस इसी पे आंख तर
अखिया भी क्या करे
वो बहुत मजबूर है
आखिरकार कान्हा से
उसकी राधा दूर हैं
हा पर राधा तो नही
समझेगी इस बात को
वो क्या जाने उसकी याद में
कौन जगता है रात को
पर खुदा तुझको तो मेरे बारे में है सब ख़बर
बहुत रोया रात भर एक खुद के जज्बात पर
वो तो गुम सुम सो रही
में यहाँ पर लिख रहा
अंधेरा कितना घना है
कुछ भी न उससे दिख रहा
टप टप आँसू गिर रहे है
बादल आँख हो गया
साल से जलता रहा हु
आधा राख हो गया
रोम रोम चिलाता है
पर रो नही सकता हु मैं
दिखता है कि जिंदा हु
पर हो नहीं सकता हु मैं
मैं जिंदा हो जाऊं ए जान ऐसा कुछ तो कर
बहुत रोया रात भर एक जज़्बात पर

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