तुम नजर

तुम नजर फ़ेर के चली गयी
में तुमको देखता ही रहा
तेरे हुस्न के चका चोन्द में
आँख सेकता ही रहा
तुम अपने घर को चली गयी
में अपने सफर को चला गया
तेरे यादो के खुशबू के संग
जाने किधर को चला गया
कई शाम थके कदमों से
तेरी खोज मैं करता रहा
हर दिन हर रात यही काम
हर रोज़ मैं करता रहा
एक शाम तू मिल गयी
अपने घर के बाम पर
मेरा होंठ फिर से
ठहर गया तेरे ही नाम पर
फिर अपने सुखी आँखों से
अश्क़ फेकता ही रहा
फिर तुम नज़र फेर के चली गयी
मैं तुमको देखता ही रहा

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