कलम का दर्द

कोरे कागज को लेकर
दिल को सुनता हुआ
मेरा कलम चल पड़ा
शब्दों को बुनता हुआ
यह दर्द का फसाद है
मन और शब्द में विवाद है
मेरी कमाई बस यही अपना
हाल मुझको याद है
अपने जख्म को लिखा
इन पन्नो पे हर बार मैं
खुद की गीत खुद का ग़ज़ल
किया खुद को ही इज़हार मैं
आज सोचता हूं कलम को मैं एक उपहार हु
इसके ही स्यायी से इसके  जख्मो को उतार दु
दिन भर बेयस्त रहता हूं मैं
दुनिया पर के काम में
मुलाकात होती है इससे
बस थोड़ी सी शाम में
मैं जब रहता हूं बेयस्त तो
तन्हाई सहता है ये
पर जब भी तन्हा मैं हुआ
मेरे साथ ही रहता है ये
दिमाक ये कहता है कि
अपने हाल की बात करू
फिर अपने दर्द से
रात भर मुलाकात करू
पर दिल की ये आवाज़ है हर बात को नकार दु
आज सोचता हूं कलम को मैं एक उपहार हु
इसके ही स्यायी से इसके  जख्मो को उतार दु

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