ग़ज़ल- पाया है

हर इश्क़ करने वाला इल्ज़ाम पाया है
यहाँ कोई बदनाम हो कर भी नाम पाया है

कौन कह रहा था उसने दर्द दिया हमको
हमने तो ये दोस्ती का इनाम पाया है

आज भी वो दूर होकर दूर नही मुझसे
मैंने उसका चेहरा आँसू मैं हर शाम पाया है

सब कुछ होती है लोकतंत्र मैं जनता ही
पर जनता ने ही खुद को अक्सर आम पाया है

हर ग़मगीन शक़्स उससे मिलता जरूर है
वो शोहरत कोई नही पाया जो शराब ऐ जाम पाया है

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